राष्ट्र-ध्वज का राजनैतिक उपयोग क्यों?-- डा विनोद बब्बर

राष्ट्र की एकता व अखंडता में प्रतीकों का अतुल्य योगदान है। इससे नागरिकों को राष्ट्र प्रेम की प्रेरणा मिलती है। यह प्रतीक भारतीय पहचान और विरासत का मूलभूत हिस्सा हैं। विश्व भर में बसे विविध पृष्ठभूमियों के भारतीय इन राष्ट्रीय प्रतीकों पर गर्व करते हैं क्योंकि वे प्रतीक प्रत्येक भारतवंशी के हृदय में गौरव का संचार करते हैं। आखिर क्यों न हो, किसी भी राष्ट्र की अस्मिता का प्रतीक होते है उसका ध्वज, उसका राष्ट्र-गान. उसका राष्ट्र गीत, उसका संविधान। दुनिया में भारत ही वह अनोखा उदारवादी देश है जहाँ दिन दहाड़े संविधान जलाया जाता है. ध्वज का अपमान होता है. राष्ट्रगीत का निरादर करने वालों का बचाव करने वाले मिल जाते है। देशविरोधी बातें कर देता है और उस पर कार्रवाई नहीं होती। इस अनावश्यक उदारता का दुष्परिणाम होता है कि देश के मस्तक प्रदेश में कुछ देशद्रोही  तिरंगा न फहरने देने की घोषणा कर देते है। देश की स्वयंभू ‘ईमानदार पार्टी’ के कार्यालय में मेजपोश के स्थान पर राष्ट्रध्वज का उपयोग करने के समाचार सुनकर याद आया कि भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति (जो बाद में राष्ट्रपति भी बने) और महान दार्शनिक डॉ. एस. राधाकृष्णन ने राष्ट्र ध्वज के तीन रंगों और अशोक चक्र की प्रतीकात्मक व्याख्या करते हुए -भगवे रंग को त्याग का प्रतीक मानते हुए, राजनेताओं को भौतिक लाभ का लोभ त्याग कर पूरी निष्ठा से देशसेवा की नसीहत दी थी। उन्होंने मध्य के श्वेत रंग को सचाई का प्रतीक मान कर अपने आचरण में पारदर्शिता और सच्चाई लाने तथा हरे रंग को देश की हरियाली का प्रतीक मानते हुए लोक हित में प्रगति का बीजारोपण करने तथा अशोक चक्र को कानून के शासन और निरंतर प्रगति का प्रतीक बताते हुए का देश के नेताओं को उसके अनुसार आचरण करने की प्रेरणा दी थी। लेकिन अफसोस कि हमारी राजनीति तिरंगे के तीनो रंगों की मूल भावना को तिलांजलि देने की होड़ लगी है। नेताओं ने तीन रंगों के समस्त अर्थ केवल निज विकास, निज हरियाली को ही मान लिया। 
तिरंगा इस देश की आन, बान और शान का प्रतीक है लेकिन इधर कुछ दल अपने राजनैतिक आंदोलन के समय तिरंगा हाथ में रखने लगे हैं। ये लोग जाने- अनजाने राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान को ठेस पहुंचाने के दोषी हैं। रैलियों में झंडे लगाए जाते हैं जो रैली के बाद ज़मीन पर पड़े मिलते हैं। क्या ये राष्ट्रीय सम्मान का अपमान नहीं है? अनेक बार जब प्रदर्शन के दौरान तनाव और टकराव की स्थिति बन जाती है और प्रदर्शनकारी उग्र हो उठते हैं तो उन्हें तिरंगें के सम्मान का ध्यान ही कहाँ रहता है। ण्ेसे में यह आवश्यक हो जाता है कि राजनैतिक और व्यक्तिगत कार्यक्रमों में ठीक उसी तरह से राष्ट्रीय ध्वज का इस्तेमाल रोका जाए जैसे तीन शेरों वाले राष्ट्रीय चिंह अथवा अशोक के इस्तेमाल पर रोक हैं। यहाँ यह स्मरणीय है कि प्रिवेंशन ऑफ इंप्रोपर यूज एक्ट 1950 की धारा 3 तथा प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट टू नेशनल ऑनर एक्ट 1971 का हवाला देते हुए कहा गया है कि इन कानूनों में राष्ट्रीय ध्वज के रंगीन व नकल अथवा पार्टी कार्यकर्ताओं के गले में दुपट्टे की तरह इस्तेमाल अथवा पार्टी की बैठकों में व दीवारों पर इसका उपयोग प्रतिबंधित किया गया है। 
गत दिवस एक राजनैतिक कार्यक्रम स्थल के पास से गुजरते हुए मुझे कूड़े के ढ़ेर में मुड़ा  सिकुड़ा मैला प्लास्टिक का तिरंगा दिखाई दिया तो मैंने आगे बढ़कर उसे उठाया और अपने बैग में रख लिया। मेरे साथ एक मित्र भी थे। उन्होंने पूरी बात को समझे बिना टिप्पणी की, ‘तो आजकल कचरा उठाने का काम भी करने लगे हो?’ उनकी शंका का समाधान करते हुए मैं उन्हें निकट के एक पार्क में ले गया जहाँ बैग से तिरंगा निकालकर दिखाया। लेकिन सवालो का सिलसिला फिर भी जारी रहा तो मैंने उनसे पूछा, ‘बंधु बेशक आपके धार्मिक विश्वास प्रतीकों को वह सम्मान और श्रद्धा न देते हो लेकिन  अगर आपका नोट, सिक्का, पुस्तक अथवा कोई अन्य कीमती सामान  गिर जाये तो आप क्या करेगे?’ इसपर वे कुछ गंभीर हुए और बोले, ‘उसे निश्चित रूप सेे उठाएगे गर उस वस्तु का कोई महत्व हो पर तुमने जिस प्लास्टिक के टुकड़े को उठाया है उसकी तुम्हारे लिए क्या उपयोगिता हो सकती है, मेरी समझ से बाहर है। आखिर इसकें बदले तुम्हें क्या मिलेगा।’
जब मैंने मुस्कुरा कर उत्तर दिया, ‘यह किसी के लिए भी प्लास्टिक या कागज का टुकड़ा हो लेकिन मेरे लिए यह मेरी मातृभूमि के स्वाभिमान का प्रतीक है। यह मेरेे देश का ध्वज है जिसे किसी नासमझ ने यहाँ फेंक दिया था।’ इस बार मेरा मित्र सचमुच गंभीर हो उठा। उसने इस विषय पर जनजागरण की जरूरत महसूस करते हुए संकल्प किया कि भविष्य में वह सजग रहेगा। 
आश्चर्य है कि जिस बात को इस देश का आम आदमी समझ रहा है उसे न तो स्वयं को ‘आम आदमी’ का प्रतीक बताने वाले समझ रहे हैं और न ही सरकार के स्तर पर कुछ किया जा रहा है। वैसे यहाँ यह भी स्मरणीय है कि कुछ दिनों पूर्व न्यायालय ने मोबाईल कंपनियों को निर्देश दिया था कि वे राष्ट्रगान को कालर टयून न बनाएं क्योंकि यह राष्ट्रीय सम्मान का अपमान है। इधर देश में गुटखे का प्रचलन बढ़ा है तो अनेक कंपनियां  मैदान में हैं। पिछले कई वर्षों से  तिरंगा नामक गुटखा खुलेआम बिक रहा है जिस पर राष्ट्रीय झंडे जैसा तिरंगा बना है। लोग उसे  खरीदतें, फाड़ते और तिरंगा वाले उस पाउच को जमीन पर फेंकतें हैं। आखिर यह क्या है? गुटखा कंपनी को इस तरह के पाउच बनाने पर सरकारों ने रोका क्यों नहीं? उस पर कार्यवाही क्यों नहीं की गई? क्या किसी को भी चाहे वह व्यवसायिक कंपनी हो या राजनैतिक दल अपने प्रचार अथवा विज्ञापन में राष्ट्र के सम्मान से जुड़े प्रतीकों  का प्रयोग करने का अधिकार मिलाना चाहिए? यदि हाँ. तो फिर हमें उनके मान-सम्मान की चिंता छोड़ देनी चाहिए। औश्र यदि नहीं तो राष्ट्रीय ध्वज से मिलते- जुलते चिंहों अथवा ध्वजों के उपयोग के इस्तेमाल की छूट पर फिर से विचार करना चाहिए। 
बेशक तिरंगा स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक दल का ध्वज था लेकिन आज वह सम्पूर्ण राष्ट्र का प्रतीक है। अतः आज किसी भी दल को उसके राजनैतिक प्रयोग की अनुमति नहीं दी जा सकती।   कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) तथा तृणमूल कांग्रेस के झंडे और राष्ट्रीय ध्वज मंे मामूली का अंतर है जैसे कांग्रेस के झंडे में  अशोक चक्र की जगह हाथ है तो एनसीपी के ध्वज में घड़ी है और ं तृणमूल कांग्रेस वाले में फूल व तृण है। यहीं क्यों भाजपा का ध्वज भी इससे मिलता जुलता है। शायद इस संबंध में भ्रम बरकरार रखने अथवा अपनी मनमानी करने वाले राष्ट्र ध्वज के इतिहास और आजादी की लड़ाई में तिरंगे तथा कांग्रेस के योगदान की दुहाई दे लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि जब कोई प्रतीक  राष्ट्रीय घोषित हो जाता है तो वह किसी की निजी सम्पति नहीं रहती। जो अशोक स्तंभ आज हमारा राष्ट्रीय चिन्ह है वह कभी अशोक की धरोहर थी लेकिन आज वह राष्ट्रीय धरोहर होकर सम्पूर्ण राष्ट्र की अस्मिता से जुड़ा है। बहुत संभव है कि पश्चिमी देशों में राष्ट्र ध्वज के सर्वत्र उपयोग की छूट, झंडे वाले कपड़े, बर्तन, जूते, चप्पल, यहाँ तक कि टायलेट सीट होने का उदाहरण दे लेकिन पश्चिमी संस्कृति और भारतीय परिवेश के अंतर को समझना जरूरी है। हमारे लिए तिरंगा एक झंडा और राष्ट्रीय पहचान होने के साथ-साथ हमारी परंपरा से जुड़ा है जहाँ सम्मान और श्रद्धा कोई विशेष अंतर नहीं है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से जारी भारतीय राष्ट्र ध्वज संहिता के अनुसार प्लास्टिक से बने झंडों का उपयोग नहीं करना चाहिए।          राष्ट्रीय ध्वज फहराते समय उसे सम्मानपूर्वक ऊंचा स्थान देना चाहिए। अन्य ध्वज राष्ट्रध्वज से अधिक ऊंचे नहीं होने चाहिए।           राष्ट्रध्वज का उपयोग वक्ता की व्यासपीठ ढकने अथवा उसकी सज्जा के लिए नहीं करना चाहिए।  राष्ट्र ध्वज को मिट्टी अथवा पानी का स्पर्श नहीं होने देना चाहिए। किसी पहनावे के लिए ध्वज के स्वरूप का उपयोग नहीं किया जा सकता। राष्ट्रध्वज गद्दी, रूमाल,  नैपकीन, तौलिया, मेजपोश भी नहीं बनाए जा सकते।  राष्ट्रध्वज पर कोई लेखन नहीं किया जा सकता अथवा उसपर किसी भी प्रकार का विज्ञापन नहीं किया जा सकता। ध्वज जिस खंबे पर फहराया गया हो उसपर विज्ञापन नहीं लगाए जा सकते। लेकिन प्रश्न यह है कि इन नियमों का पालन कितना हो रहा है। कानून में राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान पर सजा एवं जुर्माने का प्रावधान जरूर है लेकिन  उसपर कितना अमल होता है यह बात दूसरी है। जागरूकता और उदासीनता की वजह से भी लोग राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान की चिंता नहीं करते। जरूरत है राष्ट्र के प्रतीकों के सम्मान को न केवल बरकरार रखा जाए बल्कि उसे और बढ़ाया जाए। जो कोई भी उनके अपमान का दुस्साहस करे उसे सख्त से सख्त सजा दी जाए। राष्ट्रीय प्रतीकों से छेड़छाड  नहीं होनी चाहिए।
इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे राजनेताओं ने 67 सालों में देश की गरीब जनता की दशा सुधारने से अधिक स्वयं की दशा सुधारने की चिंता की है। आज भी करोड़ों लोग भर पेट भोजन से महरूम हैं जबकि लाखों टन अनाज सड रहा है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि इसमें राष्ट्र का दोष है। देश के नेता भ्रष्ट हो सकते हैं लेकिन उन्हें चुना तो स्वयं हमने ही है। आखिर देश के प्रतीकों का उनमें क्या दोष? अगर हम देश के प्रतीकों को इस रूप में प्रस्तुत करेंगे तो देश के दुश्मनों को कैसे रोकेंगे? 
क्या खूब कहा है  शायर मुज़फ्फर रज्मी ने- 
ज़हर देता तो नज़र में आ जाता, उसने यों किया-  बस वक्त पर दवा न दी!
राष्ट्र-ध्वज का राजनैतिक उपयोग क्यों?-- डा विनोद बब्बर राष्ट्र-ध्वज का राजनैतिक उपयोग क्यों?-- डा विनोद बब्बर Reviewed by Vinod Babbar on 22:50 Rating: 5

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