दीप ज्योति नमस्तुते Deep Jyoto Namostute VINOD BABBAR


दीप ज्योति नमस्तुते ---डा विनोद बब्बर जिस वातावरण के बीच हम पले बढ़े हैं, वहां उत्सवप्रिय दृश्यों की श्रृंखला देखने में आती रही है। भारत से ज्यादा उत्सवधर्मिता शायद ही कोई राष्ट्र धारण कर अपने कार्य-क्षेत्र से विलग होकर अधिकार पूर्वक अवकाश लेता हुआ जश्न मनाता हो। उत्सव प्रियता मनुष्य के अच्छे स्वास्थ्य की पैरोकार है। खुशियां पैदा करना उसकी सकारात्मक सोच का नतीजा माना जा सकता है। अंधकार और प्रकाश अर्थात् अज्ञानता और ज्ञान का संघर्ष मानव सथ्यता के विकास की कहानी है क्योंकि अंधकार एक आवरण है, एक भय है, आशंका है, स्वप्न है, इसलिए उसमें जड़ता है, अकर्मण्यता है, एकरूपता है, निद्रा है, अस्तित्व का विलय है। अतः तिमिर त्याज्य है, उपेक्षणीय है। प्रकाश में, आलोक में चेतना है, विविधता है, सक्रियता है, कर्मठता है, जागरण है एवं अस्तित्व की सुरक्षा है, इसी कारण आलोक वरेण्य है। मनुष्य ने अपनी बुद्धि और विवेक के बल पर संसार के प्रत्येक अंधकार को चुनौती दी और हर अंधेरे में उजाले की सृष्टि करने का प्रयास किया। जग से मन तक के हर अंधेरे को दूर करने के लिए उसने उत्सव रचे, जिनमें सर्वोपरि है दीपावली। विजयी दीपशिखा का असीम उल्लास है- दीपावली। पराजित अमावस्या का उच्छवास है- दीपावली। निबिड़ अंधकार का पलायन है- दीपावली। आलोक-सुरसरि का धरती पर अवतरण है- दीपावली। आकाश के अनंत-नक्षत्र-मंडल से धरा की मूर्तिमान स्पर्धा है - दीपावली। मनुष्य के मन-मस्तिष्क का चिर-आलोक है - दीपावली। अंधकार पर प्रकाश की विजय का पर्व है - दीपावली। दीपावली दीयों का और प्रकाश का, धरती को सितारों से भर कर आकाश बना देने का पर्व है। सूर्य के पुत्र नन्हें-नन्हें दीये जो विभिन्न रूपों और आकारों के हो सकते हैं लेकिन अपना श्रेष्ठ प्रकाश सप्त रंगों को बिखेर इंद्रधनुष की तरह तन जाए। पुरूषार्थ से प्राप्त लक्ष्मी, काम पर राम की विजय का उत्सव, जीवन को मृत्यु से निर्भय करने वाली यम द्वितीया, सामाजिक शालीनता, मर्यादा और प्रेम के सात्विक स्वरूप को प्रकट करने वाली भाई दूज, ज्ञान और शिक्षा के प्रतीक कलम-दवात की पूजा कर चेतना को जाग्रत करने तक दीपावली मात्र एक पर्व नहीं, पर्वों-पुंज है। प्रकाश जब होता है तो वह संपूर्णता में प्रकाशित होता है, चयन नहीं करता, जीवन के हर धर्म-गुण को आलोकित करता है। यह घर की सफाई का ही नहीं, निराशा, उन्माद या आक्रोश से मन में उत्पन्न विकारों को साफ कर मन को स्फटिक आंगन बना देने का त्यौहार है। लक्ष्मी की पूजा शंख, चक्र, गदा, पद्म के चार पुरूषार्थों से संपन्न हो कर ही की जा सकती है। उलूक का वाहन ले कर आने वाली लक्ष्मी सचेत करती है कि हमारा वैभव समृद्धि अंहकार उत्पन्न कर वाला नहीं बना रहे। अहंकार युक्त सामर्थ्य महिष बनाती है और उसका मर्दन करने के लिए उसी वरदा लक्ष्मी को जिसने धन और वैभव दिया, विष्णु और शिव का तेज प्राप्त कर दुर्गा का स्वरूप धारण करना पड़ता है। धर्मनियंत्रित पुरूषार्थ से अर्जित लक्ष्मी के संयमित उपभोग को ही लक्ष्मी पूजा माना जाना चाहिए। गौ तो प्रतीक है प्रकृति के उस उपहार का जो जीवन और चेतना का पथ प्रदान करती है और गोवर्धन का अर्थ ही जीवन और चेतना को प्रवाहित करने वाले तत्वों से है। गोवर्धन की पूजा के बावजूद क्या हम ऐसा कर रहे हैं? नदियां प्रदूषित होकर मृत हो रही हैं, वृक्ष कट रहे और वन रेगिस्तान बन रहे हैं, उपभोग के आधुनिक साधनों से उत्पन्न विष प्राणवायु को प्राणांतक पीड़ा दे रहा है। 500 ईसा वर्ष पूर्व की मोहनजोदड़ो सभ्यता के प्राप्त अवशेषों में मिट्टी की एक मूर्ति के अनुसार उस समय भी दीपावली मनाई जाती थी। उस मूर्ति में मातृ-देवी के दोनों ओर दीप जलते दिखाई देते हैं। युगों-युगों से दिवाली एक ऋतु उत्सव कृषि उत्सव रहा है क्योंकि कृषि के विकास के साथ-ही-साथ ग्रामीण स्वतंत्रता भी विकसित हुई है। फसल पकी, धान, कोदों, सामा, ज्वार, मक्का और बाजरा की फ़सलें कटकर घर आई, कृषकों के त्योहार मनाने का क्षण आया। सबसे अधिक प्रमुखता मिली धान को, क्यों कि यह आदिम अन्न है। धान की खील बनी। खील अपने आप में प्रकाश की प्रतीक है। खील की निर्माण प्रक्रिया देखें। काली-कलूटी धानी अग्नि के संपर्क में आकर अग्नि के ताप का संस्पर्श पाकर खिल गई। श्वेत-शुभ्र खील। कार्तिक की प्रमुख काली उपज धानी के गर्भ से जनमी श्वेताभा यानी तप के प्रभाव से तमोगुण में से सतोगुण जनमा हो तम के भीतर से सत खिला हो जैसे - इसीलिए इसे खिली कहा गया होगा, जो कालांतर में खील बन गया। मनुष्य ने अपनी बुद्धि-विवेक से युग परिवर्तन कर दिखाया। सुख-समृद्धि बढ़ी तो लक्ष्मी-पूजन की परंपरा विकसित हुई। लेकिन धन की हवस उसे द्यूत-क्रीड़ा तक ले गई । ऐसे समय में सुधारवादियों ने जीवन-दृष्टि में लक्ष्मी के साथ गणेश के भी पूजन की परंपरा का विकास किया गया। गणेश विवेक के देवता हैं। विवेकहीन लक्ष्मी विलासोमुख होगी। अकेली लक्ष्मी से जनमा रजोगुण विकृतियों को जन्म देगा। अतः गणेश साथ रहें, जो सत के प्रतीक हैं। एक और अर्थ- जहां लक्ष्मी के साथ विवेक रूप गणेश न होंगे, लक्ष्मी का अपव्यय होगा। लक्ष्मी स्थायी न रहेगी। व्यक्ति और समाज का कल्याण इसी में है कि लक्ष्मी के साथ गणेश सदा विराजमान रहें। उपार्जन में ही नहीं, व्यय में भी साथ रहें। कभी स्वामी विवेकानंद ने कहा था- दीपावली अर्थात आलोक का विस्तार। एक नन्हा-सा दीप असंख्य दीपों को शिखा सौंप सकता है। प्रकाश ज्ञान का, शिक्षा का प्रतीक है। अशिक्षा के अंधकार में एक ज्ञान दीप ही अनेक अशिक्षितों को शिक्षित बनाए। ज्योति से ज्योति जले। अज्ञान तिमिर की कालिमा ढले। दीपावली ज्ञान की संदेश- वाहिका बने। मिट्टी के दीए में स्नेह की बाती और परोपकार का तेल डालकर उसे जलाते हुए भारतीय संस्कृति को गौरव और सम्मान देता है, क्योंकि दीया भले मिट्टी का हो मगर वह हमारे जीने का आदर्श है, हमारे जीवन की दिशा है, संस्कारों की सीख है, संकल्प की प्रेरणा है और लक्ष्य तक पहुँचने का माध्यम है- मंजिल मिल ही जायेगी भटकते ही सही, गुमराह तो वो है जो घर से निकले ही नहीं हाँ, यह भी कटू सत्य है कि स्वाधीन भारत में लक्ष्मी का प्रकाश कुछ गिनी-चुनी मुँडेरों पर केंद्रित होकर रह गया है। वह कुछ भ्रष्ट तिजोरियों में कैद होकर रह गई है। देश से विदेशी खातों तक लक्ष्मी के शुभ्र प्रकाश पर उलूकों का कब्जा है। कालेधन के कुचक्र में फँसकर लक्ष्मी अंधकारोन्मुख हो गई। इसी कारण आज भी कुछ मुँडेरों पर तो असंख्य दीप जगमगा रहे हैं लेकिन असंख्य झोपड़ियों में घनघोर अंधेरा है। दीपावली के हर कुटिया तक पहुंचे बिना ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’, का कोई अर्थ नहीं है। देश की बदली हुई फिजा मांग कर कह रही है कि अंधेरी लक्ष्मी (काला धन) का विनाश हो। शुभ्र सतोगुणी सर्व मंगला लक्ष्मी का उदय हो। दीप ज्योति नमस्तुते! ---डा विनोद बब्बर
दीप ज्योति नमस्तुते Deep Jyoto Namostute VINOD BABBAR दीप ज्योति नमस्तुते  Deep Jyoto Namostute VINOD BABBAR Reviewed by rashtra kinkar on 21:10 Rating: 5

No comments