न्याय की जीत या जीत का न्याय???

आखिर सलमान को बरी कर ही दिया गया। कल लालू और चौटाला जैसे लोग भी बरी हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इसीलिए यह धारणा बल पा रही है देश में दो तरह के कानून है। एक गरीबों के लिए तो दूसरा ‘शरीफो’ के लिए। कुछ यही बात गत दिवस लोकसभा के कांग्रेस नेता खड़गे साहब ने कही जब वे एक अदालत द्वारा किसी मामले में सोनिया जी को तलब किये जाने के विरोध में संसद का सामान्य कामकाज रोकने का प्रयास कर रहे थे। संभवत वे भी अपनी नेता के लिए ‘शरीफो’ वाले कानून की आपेक्षा कर रहे हो लेकिन  गरीबों के कानून पर उन्होंने अथवा किसी अन्य नेता ने इस सत्र के दौरान कुछ कहा हो ऐसी जानकारी प्राप्त नहीं हुई। 
निश्चित रूप से सलमान बड़े अभिनेता है। उन्होंने बड़े-बड़े काम किये होंगे। ऐसे में बड़े लोगों से उनके संबंध होना स्वाभाविक है। इसलिए उनके साथ बड़े लोगो जैसा व्यवहार होना भी अस्वाभाविक नहीं है। इस संबंध में अगस्त 2014 में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायामूर्ति श्री बीएस चौहान ने की टिपपणी विशेष ध्यान की मांग करती है जिसके अनुसार उन्होंने कहा था, ‘वरिष्ठ वकीलों ने देश की न्यायिक व्यवस्था को कब्जे में कर रसूकदार लोगो के लिए सुरक्षित स्वर्ग बना दिया है। जिसकी वजह से सामान्य नागरिको को न्याय तो क्या, सुनवाई का मौका भी नहीं मिलता।’
कोई भी सभ्य समाज नियम- मर्यादाओं का पालन किये बिना नहीं चल सकता। बेशक हर व्यक्ति के कुछ अधिकार हैं लेकिन हर अधिकार कर्तव्य पालन से जुड़ा हुआ है। यदि समाज किसी व्यक्ति विशेष को अपना स्नेह, समर्थन प्रदान करता है या कोई साधन संपन्न हैं तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि सैलेब्रिटी अथवा लीडर  होकर वह कानून से परे हैं। यह फैसला देते हुए माननीय न्यायमूर्ति ने बेशक ठीक ही कहा कि ‘अदालत तथ्यों और सबूतों के आधार पर फैसला करती है, जनमत के अनुसार नहीं।’ भारतीय संविधान कानून की समानता का उद्घोष करता है लेकिन यदाकदा ऐसे उदाहरण भी सामने आते हैं जिनसे आम आदमी के दिल में बनी न्यायपालिका की छवि प्रभावित होती है। शायद इसका कारण न्याय की वह अवधारणा भी हो सकती है जिसके अनुसार- ‘बेशक सौ अपराधी छूट जाये पर एक बेकसुर को सजा नहीं मिलनी चाहिए।’ 
13 वर्ष पहने शराब पीकर फुटपाथ पर सो रहे लोगों को अपनी गाड़ी से कुचलने के मामले में  उसके खून की जांच से स्वीकृत सीमा से ज्यादा शराब की मात्रा होने की पुष्टि हुई। उस समय उसी गाड़ी में मौजूद पुलिस द्वारा प्रदान किये गए सुरक्षा गार्ड ने अदालत में दिए अपने बयान में शराब पीकर  तेज गाड़ी चलाने की पुष्टि करते हुए कहा कि उसने खुद सलमान को धीरे गाड़ी चलाने के लिए कहा था। उसपर भी यह सिद्ध हो चुका है कि वह बिना ड्राइविंग लाइसेंस के गाड़ी चला रहा था। इन तमाम सबूतों के बाद उस घटना के 12 साल बाद अचानक दोषी के पारिवारिक ड्राइवर का स्वयं को दोषी बताना अदालत को धोखा देने की कोशिश सरीखा था लेकिन तमाम तरह के दबावों, तर्कों को अस्वीकार करते हुए दोषी को पांच साल की सजा सुना दी। 
जहां तक इस मामले के निपटारे में 13 साल लगने का प्रश्न है, इसे आदर्श स्थिति नहीं कहा जा सकता। लेकिन कमोवेश यही स्थिति सारे देश की है। दशकों मामलों का लटके रहना जहां  पीड़ित को न्याय से दूर रखता है वहीं आरोपी भी तारीख दर तारीख अदालतों के चक्कर लगाते हुए वकीलों के तर्को के बीच अनिश्चय में रहता है। सभी का समय ही नहीं कीमती संसाधन भी लगते हैं। अनेक बार तो न्याय की इंतजार इस जीवन के बाद भी जारी रहती है। लेकिन इस मामले में जहां एक ओर 13 वर्षों के इंतजार के बाद सजा टालने के लिए हाई कोर्ट  की चुस्ती-फूर्ती दिखाई गई वह अनेक सवाल खड़े करती है। जिला अदालत द्वारा दोपहर बाद सजा सुनाने के बाद फैसले की प्रति प्राप्त कर एक जाने- माने वकील का  मुंबई हाईकोर्ट में अंतरिम जमानत की याचिका दायर करना। माननीय अदालत में तत्काल सुनवाई के बाद लगभग पांच बजे अंतरिम जमानत दिया जाना। हाई कोर्ट के आदेश की प्रति तत्काल जारी होना जबकि शाम को आए फैसलों की प्रति अगले दिन दी जाती है। उसके बाद की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। जिला अदालत 5.30 बजे तक ही कार्य करती है परंतु माननीय न्यायाधीश महोदय द्वारा आदेश की प्रति के इंतजार में 6.20 तक अदालत में उपस्थित रहकर अभियुक्त को घर जाने देना अनेक प्रश्न उपस्थित करता था। अभी वे प्रश्न सुने समझे भी नहीं गए कि नई परिस्थिति ने प्रश्नों पर ही प्रश्न चिन्ह लगाते हुए सबूतों का भरोसे योग्य न बताते हुए उसे बरी भी कर दिया। जबकि 2001 में उच्चतम न्यायालय में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आनंद और न्यायामूर्ति की खण्डपीठ ने कहा था, ‘संदेह का लाभ तभी दिया जा सकता है जब आरोपो के विरूद्ध अकाटय प्रमाण प्रस्तुत किये जाये।’ प्रस्तुत मामले में कौन से अकाट्य प्रमाण प्रस्तुत किये गये है इसकी जानकारी शायद ही किसी को हो। न्यायालय के फैसले के संकेत एक दिन पूर्व ही प्राप्त होने लगे थे जब सुरक्षा गार्ड केे बयान को ‘अविश्वसनीय’ करार दिया गया।  
लोकतंत्र की बात तो सभी दोहराते है। परंतु सामान्य व्यक्ति के दर्द को दूर करने को कोई तंत्र नहीं है। वरना इस देश में बरसों से लटके मुकट्टमों को बोझ घटाने के लिए क्या किया जा रहा है। स्वयं मेरा चैक वापसी का केस पिछले 8 साल से चल रहा है। लगभग हर दूसरी तारीख पर जज या कोर्ट बदल जाते हैं। चैक वापसी मामले में धारा 138 के मुकद्दमे को 6 महीने में हल करने की बात कानून में है। जबकि मेरे मामले में एक बार 14 महीने बाद की डेट दी गई थी। नवम्बर, 2015 में न्यायिक क्षेत्र कानून के तहत उसे रोहिणी से तीस हजारी भेजने की बात कहीं पर 7 दिसम्बर को केस फाइल ही तीस हजारी नहीं पहुंची। पूछताछ का भी कोई नतीजा नहीं निकला। जितने का चैक है उससे ज्यादा का समय और संसाधन बर्बाद हो चुके है। सोचता हूं केस वापस लेकर धोखा देने वाले ‘शरीफ’ को मैं खुद ही बरी कर कोर्ट का बोझ हल्का कर दूं। 
इस फैसले पर कुछ ‘शरीफ’ लोगों का तर्क है- ‘यदि पीड़ित संतुष्ट नहीं है तो वे उसके विरूद्ध उच्चतम न्यायालय में जा सकते है।’ ऐसे महापुरुषों जानबूझ कर अनजान बनने की कोशिश कर रहे हैं या वे सचमुच इतने नासमझ है कि वे नहीं जानते- अगर वे महंगे वकील करने योग्य होते तो क्या फुटपाथ पर सोते? सरकार, प्रशासन तथा न्यायपालिका ऐसे लोगों की चेरी नहीं हो सकते जो असमानता को बढ़ावा देते हो अथवा कुछ लोगों के लिए विशेषाधिकार और शेष के लिए शून्याधिकार के पक्ष हो। आखिर वह नासमझ नहीं होेगा जिसने कहा था- ‘न्याय मिले न मिले, न्याय दिखना जरूर चाहिए।’ यदि लोगों  का कानून पर से विश्वास उठ जाये तो समाज को अव्यवस्था से कोई नहीं बचा सकता। अव्यवस्थित समाज ने तो उन्नति कर सकते हैं और न ही अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा कर सकते है। 
आश्चर्य है कि कार्यपालिका के हर छोटे बड़े मामले में हस्तक्षेप, यहां तक कि नालियों की सफाई पर आदेश देने वाले हमारी न्यायपालिका यह नहीं देख पा रही है कि उसकी नाक के नीचे कितनी गन्दगी है। क्या बरसो मुकद्दमे लटकने के लिए संसाधनों, अदालतों की कमी बताने वाली किसी सरकार को मेरे ‘मी लार्ड’ ने इसके लिए दोषी ठहराते हुए कोई कार्यवाही की है? यूअर आनर! आप सरकारी विभागों के लिए समय सीमा तय करते हो। अधिकारियों को बुलाकर डांट भी पिलाते हो। बस इतना बता दीजिए, गरीब के मुकद्दमे की समय सीमा कब तय करोगे? क्या न्याय से वंचित रहना मानवाधिकार की श्रेणी से है?  ‘शरीफो’ के लिए नियमों को नरम करने पर तो बहुत जोर है पर ‘गरीबो’ के लिए किसी के मन में क्या है कभी प्रकटीकरण नहीं किया जाता। इस सम्पूर्ण परिदृश्य में यह जानने की उत्सुकता सभी को हो सकती है कि ‘शरीफ’ के लिए निर्धारित समय के बाद कोर्ट में उपस्थित रहने वाले माननीय न्यायमूर्ति जी क्या इनदिनों  ‘गरीबों’ के लिए भी अतिरिक्त समय लगाकर न्यायिक बोझ को घटाने में अपना योगदान कर रहे हैं? यदि इसका उत्तर ‘न’ में है तो किसी के मुंह पर ताला नहीं लगाया जा सकता। .. और यदि उत्तर हां है तो ‘कानून के अच्छे दिन’ आ रहे  है।
 भला हो सोशल मीडिया का जो अब किसी भी तरह के भेदभाव पर मौन रहने को तैयार नहीं। इसीलिए तो पूछा जा रहा है- ‘इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कार कौन चला रहा था। पर ये जानना जरूरी है कि कोर्ट कौन चला रहा था?’ एक अन्य ने कहा- ‘जब फुटपाथ ने जानबूझ कर कार के सामने आने की बात कबूल ही ली तो न्याय के लिए दो मिनट के मौन की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।’ मेरे मन में घूम रहा है-
उसी का शहर उसी का खुदा और उसी के गवाह, 
फिर भी पूछते हो-- कुसूर किसका निकलेगा?
 विनोद बब्बर   09458514685
न्याय की जीत या जीत का न्याय??? न्याय की जीत या जीत का न्याय??? Reviewed by rashtra kinkar on 05:00 Rating: 5

3 comments

  1. किसी ने कहा है कि 'पतंग' उड़ाने से भी 'न्याय' मिलता है...

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  3. या फिर न्याय सदा से ही सत्ता की .......

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