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जरा गौर से देखियें इस चित्र को.......!
शायद आपने सही पहचाना। इस तस्वीर में एक सोफे पर कपड़े पहने एक कंकाल है। 80 वर्षीय आशा साहनी मुंबई के पॉश इलाके में 10 वी मंजिल पर चार वर्ष पूर्व पति की मौत के बाद एक अपार्टमेंट में अकेले रहती थी। उसका इकलोता बेटा अमेरिका में था। उसके पास अपनी मां के लिए आने या उसे अपने साथ रखने के लिए समय नहीं था या जीवन की सांझा पर खड़ी आशा साहनी की जीवन शैली उसके अपनेे लाइफ फारमेट में फिट नहीं बैठती थी, समझना मुश्किल नहीं है। 
बेटे ने अंतिम बार 23 अप्रैल 2016 को मां से फोन पर बात की थी। ह्वाटसअप पर बात भी संदेशों का आदान प्रदान होता था। मां ने कहा-अब अकेले घर में नहीं रह पाती हूं। अमेरिका बुला लो। अगर वहीं नहीं ले जा सकते हो तो ओल्ड एज ही होम ही भेज दो अकेले नहीं रह पाती हूं।
बेटे ने कहा-बहुत जल्द वह आ रहा है।
कुल मिलकार डॉलर कमाते बेटे के लिए अपनी मां से बस इतना सा लगाव था कि उसके मरने के बाद अंधेरी का महंगा अपार्टमेंट उसे मिले।  इसके लिए वह यदा कदा मतलब कुछ महीनों पर आशा साहनी की खैरियत ले लिया करता था जो उसकी मजबूरी थी। 
चूंकि उसे अगस्त में आना ही था, इसलिए उसने 23 अप्रैल 2016 के बाद मां को फोन करने की जरूरत नहीं समझी। वह 6 अगस्त को किसी टूर टाइम प्रोग्राम में मुंबई आया तो उसने ‘सुयोग्य पुत्र’ होने अपना फर्ज निभाते हुए  आशा साहनी से मिलने का वक्त निकाला और अंधेरी स्थित उस  अपार्टमेंट में पहुंच कर बेल बजायी। लेकिन कोई रिस्पांस नहीं. तो उसे. लगा कि बूढी मां सो गयी होगी। जब एक घंटे तक कोई हलचल नहीं हुई तो उसने लोगों को बुलाया। पता चलने पर पुलिस भी आ गयी। गेट खुला तो सभी हैरान रहे। आशा सहनी की जगह उनका कंकाल पड़ा था। आधा सोफे पर तो आधा नीचे। शरीर तो गल ही चुका था, कंकाल भी पुराना हो चला था। जांच में यह तथ्य सामने आया कि  उनकी मौत  8 से 10 माह पूर्व हो चुकी थी। दसवें फ्लोर पर केवल दो फ्लैट है। बंद फ्लैट से बाहर गंध नहीं आ सकी।
बेटे के पास इस बात का कोई जवाब नहीं कि अप्रैल 2016 के बाद उसने मां से बातचीत तक क्यों नहीं नहीं। स्पष्ट है कि वह अपनी मां से नियमित सम्पर्क में ही नहीं था। संभवतय बूढ़ी आशा साहनी ने भी स्वयं को अन्य रिश्तेदारों सहित सभी से स्वयं को इसलिए काट दिया होगा कि जब अपने बेटे के लिए ही वह बोझ है तो दूसरे भी उसकी मदद कहां करेगें। 
मनुस्मृति को दिन रात कोसने वाले कहां जानते हैं कि मनुस्मृति द्वितीय अध्याय के 121 वे श्लोक में कहा गया है- अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः ।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलम्।। अर्थात् जो लोग नित्य प्रति अपने वृद्धजनों का सम्मान एवं अभिवादन करते हैं, उनके यश, विद्या, आयु और बल-बुद्धि की अभिवृद्धि होती हैं। 
महात्मा चाणक्य भी वृद्धजनों की सेवा से विशेष ज्ञान एवं विज्ञान की प्राप्ति की चर्चा करते हैं। हमारे अन्य शास्त्रों में माता-पिता और गुरू की बड़ी महिमा बताई गई है। जो तीनों का आदर, सम्मान व सेवा करके उन्हें प्रसन्न करता है, वह तीनों लोकों को जीत लेता है और अपने शरीर से दिव्यमान होता हुआ सूर्यादि देवताओं के समान स्वर्ग में आनन्द लेता है। लेकिन किसे जरूरत है कि वह इन ग्रन्थों को पढें या इनसे कुछ सीखें। स्कूल ही एकमात्र स्थान है जहां मजबूरी में भी कुछ न कुछ पढ़ना ही पढ़ता है लेकिन वहां भी पाठ्यक्रम से नैतिक शिक्षा गायब है। संस्कृति, संस्कार का दायित्व बेलगाम टीवी और इन्टरनेट पर है। फिलहाल दो आंसू आशा साहनी के लिए न सही, अपने आने वाले कल के लिए जरूर बहा दीजिये और कुछ देर बाद इसे भी किसी नाटक की तरह भुला दीजिये। क्योंकि आपने अपने माता- पिता और सास- ससूर के प्रति अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया लेकिन आपको विश्वास है कि आपके साथ ऐसा कुछ नहीं होगा क्योंकि आपकी संतान बहुत ‘नेक’ है। 
सावधान- अगर आपको गलतफहमी है कि आपकी ‘नेक’ संतान आपके बारे में कुछ नहीं जानती तो आप स्वयं को धोखा दे रहे हैं। @ विनोद बब्बर


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