घटते साधन, बढ़ती जनसंख्या-- डा. विनोद बब्बर

विश्व जनसंख्या दिवसः 11 जुलाई पर विशेष
आज का विश्व बढ़ती जनसंख्या के कारण दिन-प्रतिदिन विकराल रूप धारण करती समस्याओं के  बोझ तले कसमसा रहा है। न केवल हमारा आर्थिक संतुलन बिगड़ रहा है बल्कि पारिस्थितिकीय संतुलन खतरे का निशान पार कर रहा है। यह तेजी से बढ़ती जनसंख्या का ही दुष्परिणाम है कि सीमित प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक दबाव पड़ रहा है, जिससे प्राकृतिक एवं मानव जन्य आपदाओं तथा जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग जैसी चुनौतियां सिर उठा रही हैं।
जनसंख्या वृद्धि के मुख्य कारणों में जन्म दर में वृद्धि तथा मृत्यु दर में कमी, निर्धनता, संयुक्त परिवार, बालविवाह, कृषि पर निर्भरता, प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि, धार्मिक एवं सामाजिक अंधविश्वास, शिक्षा का अभाव प्रमुख हैं। जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए जनजागरण की आवश्यकता को देखते हुए हर वर्ष 11 जुलाई को ‘विश्व जनसंख्या दिवस’ मनाया जाता है। इसी दिन अर्थात् 11 जुलाई 1987 को जब दुनिया की जनसंख्या 5 अरब हुई थी, तो  संयुक्त राष्ट्र संघ ने परिवार नियोजन का संकल्प लेने के दिन के रूप में स्मरण करने का दिवस घोषित किया। तभी से इस दिन का पूरी दुनिया में विशेष महत्व है, क्योंकि आज दुनिया के हर विकासशील और विकसित देश, जनसंख्या विस्फोट से चिंतित हैं। विकासशील देश अपनी आबादी और जनसंख्या के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहे हैं तो विकसित देश पलायन और रोजगार की चाह में बाहरी देशों से आकर रहने वाले शरणार्थियों के कारण परेशान हैं। 
आज विश्व की जनसंख्या 7 अरब को पार कर चुकी है जो वर्ष 2100 तक लगभग ग्यारह अरब होने का अनुमान है। जनसंख्या की वृद्धि मुख्यतः विकासशील देशों में होने की संभावना है। इसमें से आधी से ज्यादा जनसंख्या अफ्रीकी देशों में होगी। वर्ष 2050 में नाइजीरिया की जनसंख्या संयुक्त राष्ट्र अमेरिका से ज्यादा हो जाने की संभावना है। आज चीन, सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है, लेकिन आने वाले समय में भारत दुनिया का सबसे बढ़ा आबादी वाला देश होने जा रहा है। यह तब है जब भारत और इंडोनेशिया जैसे देशों में प्रजनन दर कम हुई है, क्योंकि इन देशों में परिवार नियोजन के विभिन्न कार्यक्रम जोर-शोर से चल रहे हैं।
जहां तक भारत का प्रश्न है भारत विश्व में दूसरी सर्वाधिक जनसंख्या  वाला देश है। भारत के पास विश्व की समस्त भूमि का केवल 2.4 प्रतिशत भाग ही है जबकि यहां विश्व की कुल जनसंख्या की 16.7 प्रतिशत जनसंख्या रहती है। हमारे कुछ राज्यों की जनसंख्या भी दुनिया के कई देशों की जनसंख्या से भी अधिक है। भारत की जनसंख्या वृद्धि दर में पिछले कुछ वर्षों से कमी आ रही है परन्तु उसके बावजूद कुल जनसंख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है, क्योकि कुल जनसंख्या का 51 प्रतिशत भाग जनन आयु वर्ग (15-49) का है। इसलिए इस जनसंख्या में प्रतिवर्ष लाखों लोग और बढ़ जाते हैं। प्रतिवर्ष 260 लाख बच्चे पैदा होते हैं। केवल 53 प्रतिशत दंपत्ती ही गर्भ निरोधक का उपयोग कर रहे हैं। प्रचलित स्तर पर जनसंख्या को स्थिर करने में अभी कई दशकों का समय और लग सकता है। वर्ष 2016 तक इस जनसंखा में 1610 लाख वृद्धि हो सकती है।  जनसंख्या का लगभग 42 प्रतिशत भाग उन बच्चों के कारण बढ़ता है जो प्रति परिवार दो बच्चों के बाद पैदा होते हैं। 
बढ़ती जनसंख्या के कारण कृषि विस्तार के लिये वनों को काटा जा रहा है। इससे कृषि योग्य बंजर भूमि तथा विविध वृक्ष प्रजातियों तथा बागों की सुरक्षित भूमि में कमी हो रही है। औद्योगिक विकास तथा आर्थिक विकास की चाह में उष्ण कटिबंधीय वनों का विनाश होते हम सभी देख रहे हैं। उष्ण कटिबंधीय सघन वन प्रतिवर्ष एक करोड़ हैक्टेयर की वार्षिक दर से लुप्त हो रहे हैं। इसका परिणाम यह है कि थाईलैण्ड तथा फिलीपीन्स जैसे देश में जो कभी प्रमुख लकड़ी निर्यातक देशों में अग्रणी थे, वनों के विनास के कारण बाढ़, सूखे तथा पारिस्थितिकी विनाश के शिकार हैं। जनसंख्या का दबाव निर्धनता, बेरोजगारी, आवास की समस्या, कुपोषण, चिकित्सा सुविधाओं पर दबाव तथा कृषि पर भार के रूप में भी देखा जा सकता है। जनसंख्या वृद्धि के पर्यावरण के विभिन्न घटकों पर गंभीर प्रभाव देखने में आये हैं। जिससे कई आर्थिक, सामाजिक समस्यायें उत्पन्न हुई हैं। आर्थिक विकास में अवरोध, पर्यावरण प्रदूषण तथा अन्य पर्यावरणीय समस्यायें, ऊर्जा संकट, औद्योगिकी-करण एवं नगरीकरण, यातायात की समस्यायें, रोजगार की समस्यायें आदि जनसंख्या के लगातार वृद्धि के ही दुष्परिणाम हैं। जनसंख्या दबाव के कारण कृषि के लिए भूमि कम हो रही है क्योंकि उनके आवास, सार्वजनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने में लगातार भूमि कम हो रही है। इसके स्वाभाविक परिणाम होगे खाद्यान्न, पेय जल की उपलब्धता में कमी। इससे समाज के बहुत बड़ा वर्ग को स्वास्थ्य और शिक्षा के वंचित रहना पड़ सकता है। 
हमने भारत में वर्ष 1952 में जनसंख्या नियंत्रण हेतु दुनिया में सबसे पहले परिवार नियोजन कार्यक्रम लागू किया। आपातकाल के दौरान हुई कुछ ज्यादतियों के दुष्प्रभावों को छोड़ दिया जाए तो यह कार्यक्रम सफलतापूर्वक अपना प्रभाव दिखा रहा है। भारत में परिवार कल्याण (परिवार नियोजन का नाम बदला गया) का उद्देश्य, जनसंख्या वृद्धि दर को 2.1 प्रतिशत पर स्थिर करने का है। इसके लिए तीन प्रकार के लक्ष्य निर्धारित किये गये हैं, जिसमें बुनियादी प्रजनन और बात स्वास्थ्य सुविधाओं के लिये समन्वित सेवाओं की व्यवस्था सहित जन्म नियंत्रण और संबंध स्वास्थ्य सुविधाओं की पूर्ति, वर्ष 2045 तक जनसंख्या को स्थिर करना, जन्म पूर्व लिंग निर्धारण तकनीक पर रोक लगाना, लड़कियों को देर से विवाह के लिये प्रोत्साहित करना इत्यादि सम्मिलित है। 
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार जिन राज्यों में वृद्धि दर अधिक होती है वहां मातृ मृत्युदर और शिशु मृत्युदर भी बहुत अधिक होती है। बार-बार जन्म देने से मां और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है और उनके जीवित रहने का जोखिम भी बढ़ जाता है। गर्भ निरोधक सेवाएं उपलब्ध होने के बावजूद भी आज केवल 53 प्रतिशत दंपत्ति ही गर्भनिरोधक का उपयोग करते है।  इस स्थिति में सुधार लाने के लिए विशेष प्रयासों की आवश्यकता है और विशेषतः ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में जहां इस दिशा में कम कार्य किया गाया है। परिवार नियोजन कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए विवाह निर्धारण अधिनियम का कठोरता से पालन करना, जनसंख्या नियंत्रण के लिये लोगों को जागरूक करने के लिये शिक्षा प्रणाली में इसे सम्मिलित करना, ग्रामीण क्षेत्रों में मनोरंजन के साधनों का विस्तार तथा महिलाओं को व्यापक स्तर पर शिक्षित किया जाना जैसे उपाय कारगर हो सकते हैं। यह तभी संभव है जब देश का प्रत्येक व्यक्ति जनसंख्या वृद्धि के दुष्परिणाम को समय रहते समझे तथा जागरूक रहते हुए इस गंभीर चुनौती से निपटने में अपना योगदान सुनिश्चित करें। 
पिछले दिनो विश्व हिंदू परिषद् के नेता श्री अशोक सिंघल ने जनसंख्या के बढ़ते असंतुलन पर प्रतिक्रिया देते हुए हिंदूओं से अधिक संतान पैदा करने का आग्रह किया तो इसपर कोई सकारात्मक टिप्पणी नहीं आई लेकिन यह आग्रह अवश्य देखा गया कि एक समुदाय किसी दूसरे समुदाय की प्रतिक्रिया में जनसंख्या बढ़ाये यह उचित नहीं है। अच्छा हो दूसरे समुदाय को भी बढ़ती हुई जनसंख्या के दुष्परिणामों के प्रति सजग किया जाए। यदि आवश्यक हो तो दो से अधिक बच्चो पैदा करने वालों पर चीन जैसे दंडात्मक निषेध लागू किए जाए। यदि इसकी शुरुआत सरकारी नौकरियों से संसद और विधानसभा में प्रवेश के लिए दो से अधिक बच्चे पैदा करने पर अपात्र घोषित करने से की जानी चाहिए। यदि ऊपर बदलाव हुआ तो निचले स्तर पर उसका प्रभाव होना लाजिम है। आशा है नई सरकार समान नागरिक संहिता कानून पर विचार करते समय देश के विकास में सबसे बड़ी बाधा बढ़ती जनसंख्या पर भी अंकुश लगाएगी। 
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