मोक्ष (कहानी) -- विनोद बब्बर

आज फिर बस अड्डे से बाहर निकलते ही मेरी नजरें उसे तलाश रही थीं। ऐसा भी नहीं है कि मुझे उससे कुछ लगाव हो। सच कहूं तो मुझे उसकी जिंदगी से नफरत रही है। कभी-कभी सोचता हूँ कि आखिर मानव का स्वभाव इतना विचित्र क्यों होता है। वह जिसे पसंद नहीं करता लेकिन फिर भी उसके बारे में लगातार जानना चाहता है। शायद इसलिए कि उसकी कठिनाईयों को देखकर उसे सकून मिलता है। पर मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस मामले में ऐसा नहीं है क्योंकि मुझे उससे हमदर्दी है पर उसकी नियति पर अफसोस।
यंू मेरा और उसका कोई संबंध भी नहीं रहा। कभी आपस में प्यार या गुस्से के दो बोल तक नहीं। मैं तो उसका नाम भी नहीं जानता। पर हाँ, उसे तब से जानता हूँ जबसे हमारे पड़ोसी घनश्याम की दूसरी पत्नी के रूप में पहली बार उसे देखा था।
यूं लाला घनश्याम बहुत बुरे आदमी नहीं थे लेकिन अच्छा भी कैसे कहंू। पहली पत्नी स्वर्ग सिधारी तो दोनो बच्चे लगभग जवान थे। लेकिन अधेड़ लालाजी को अपनी गृहस्थी बसाने की चिंता थी। अनेक लोगों से सुनने को मिलता कि वह हर मिलने-जुलने वाले से घर की देखभाल करने वाला कोई न होने और ‘अपना ध्यान रखने’ की चर्चा किया करते थे। एक दिन मिले तो मुसझे भी कुछ इसी तरह की गुजारिश की। मैंने पलटकर कहा, ‘लालाजी, क्यों आपकी अकल मारी गई है। लड़की जवान है उसकी शादी करों, साल-दो साल में बेटा भी जवान हो जाएगा। बहू आ जाएगी तो घर अपने आप संभल जाएगा।’
अपने स्वभाव के अनुरूप लालाजी शांत रहे। कुछ देर मौन के बाद अत्यंत करूण स्वर में बोले, ‘आप मेरी व्यथा कहाँ समझेगे। जिसके सिर पर आती है वहीं जानता है। बच्चों की शादी एक दिन में तो होने वाली है नहीं। अचानक जो वज्रपात हुआ है उससे उबरने में समय लगेगा कि नहीं? इसी बीच कोई योग्य वर देखकर बच्ची के हाथ पीले कर दूंगा, लेकिन तब तक कोई तो चाहिए घर की देखभाल के लिए। अब आप ही बताओं, मैं कमाने जाऊ या घर की साफ- सफाई, चूल्हा चौका करूं?’
बात पते की थी पर फिर भी हिम्मत करके मैंने कहा, ‘लालाजी, घर के काम के लिए आप कोई माई क्यों नहीं रख लेते। किसी गरीब को रोजगार मिल जाएगा और आपकी समस्या भी......!’  लेकिन मेरी बात बीच में ही काटते हुए कहा उन्होंने, ‘कहना जितना आसान है, व्यवहारिक रूप में उतना ही कठिन। जिसके बीतती है वहीं जानता है। फिर दिन भर के लिए कौन आएगा। रसोई बर्तन के लिए एक, तो साफ-सफाई के लिए दूसरी और कपड़े धोने के लिए तीसरी। उस पर भी जमाना खराब है। क्या  मैं दिन भर उसकी चौकीदारी करूं? पैसे भी दूं और उसपर भी कभी कभी ऊंच-नीच हो गया तो मैं किसको मुंह दिखाऊंगा। मैंने काफी सोच विचार कर फैसला किया है आखिर मन भी तो कहां मानता हैं?’
‘मन की बात’ का कोई जवाब मुझसे देते नहीं बना इसलिए मौन ही रहा। कुछ दिनों बाद लाला संग एक नारी को देख सभी ने समझ लिया गया कि घर बस गया है। आयु में पति से काफी छोटी, साधारण चेहरे और मजबूत कद -काठी वाली यह स्त्री अपने काम से काम रखती। इतने वर्षों में शायद ही कभी किसी पड़ोसी से बात करते देखा गया हो। यह जानकारी मिली कि वह किसी संपन्न परिवार से है। पहले पति ने उसे त्याग दिया है क्योंकि वह बहुत सुंदर नहीं थी। यहां भी उसकी स्थिति कोई बेहतर नहीं थी। सुबह अंधेरे से देर रात तक घर का हर काम करने के बाद भी बच्चे उसका तिरस्कार करते। कुछ दिन बीतने के बाद पति ने भी उसको प्रताड़ित करना आरंभ किया। कोई दिन ऐसा बीतता जब उससे मारपीट न होती।  कभी- कभी मेरा मन उसके प्रति करूणा से भर उठता। चाह कर भी कुछ न कर सका। हाँ, यह अवश्य सोचा करता कि वह विरोध क्यों नहीं करती? उसके मायके वाले उसकी सुध नहीं लेते? दिनभर मेहनत करके दो वक्त की रोटी ही तो खाती है जो कहीं भी आराम से मिल सकती है। आखिर इस जिंदगी से जोंक की तरह क्यों चिपटी हुई है? क्यों नहीं उतार फेंकती गले में लिपट इस नाग को जो प्रति क्षण उसे डस रहा है? पर दूसरे ही क्षण बुद्धि तर्क प्रस्तुत करती, ‘एक घर तो छूट गया, औरत जात है, आखिर कितनी जगह धक्के खाएगी। कुछ मान- मर्यादा, कुछ मजबूरियां, कुछ नसीहतें जरूर इसका रास्ता रोकती होंगी वरना कौन इतने कष्ट सहता है। बेहतर भविष्य की आशा भी तो हर कष्ट सहने की शक्ति प्रदान करती है। ईश्वर एक दिन जरूर इसकी सुनेगा।
बेटी के ससुराल जाने के बाद स्थिति में परिवर्तन की आशा थी लेकिन शादी में उसकी दशा किसी दासी से भी बदतर देख सारी आशाएं धूमिल हो गई। धैर्य की उस प्रतिमूर्ति को बिना किसी शिकायत चुपचाप अपने काम में लगे देख लालाजी के प्रति मन में उपजा हमारे मन का रोष न जाने कहां काफूर हो जाता।
सुख का समय पंख लगाकर उड़ जाता है पर दुःख तो कछुए की चाल से भी आगे नहीं सरकता। उसकी दशा मोहल्ले भर को आंदोलित करती थी लेकिन लालाजी मस्त थे। दाई ने एक ही साल में चार बार गर्भपात  की बात बतायी तोे संदेह हुआ कि लाला इंसान है या हैवान? पर कहे कौन? ऐसे आदमी से यह भी डर था कि कहीं उसी बेचारी पर चरित्रहीनता का आरोप न मढ़ दे।
बेटे की शादी के बाद तो बहू ने उस बेचारी को लगभग बेदखल कर दिया। दिन भर घर के बाहर बैठे बर्तन मांजना, कपड़े धोना, अनाज साफ करना और बाहर ही  बची खुची दाल सब्जी के साथ कुछ मिल गया तो मिल गया वरना वो भी नहीं। हाँ, लालाजी रात में उसे जरूर अपने कमरे में ले जाते। सुुबह होते ही मैले कुचले कपड़ों में फिर घर से बाहर कर दी जाती। जिंदगी और जिल्लत एकाकार हो रहे थे लेकिन न तो उसे शिकायत की और न ही लाला के मन में ग्लानि का कोई भाव कि कभी बहू को इस व्यवहार के लिए टोके।
पोते के जन्म पर लालाजी के घर उत्सव का माहौल था। छठी पर कई मित्र-रिश्तेदार आमंत्रित थे। शानदार दावत की व्यवस्था थी। इस शुभ अवसर पर मुझे कुछ बदलाव की आशा थी लेकिन उसे वहां न पाकर आशंका हुई। उसे टेंट के पिछवाड़े मौन बैठे देख मैं भी बिना दावत के लौट आया।
पर विधाता को इतने पर भी शायद संतोष न था। अचानक लालाजी को दिल का दौरा पड़ा और वह विधवा हो गई। कुछ दिन रो-धोकर सब अपने-अपने काम में उसे भूल से गए। बेशक समाज और कानून की दृष्टि में विधवा के भी कुछ अधिकार होते हैं, परिवार  का उसके प्रति कोई कर्तव्य होता है लेकिन वह अवांछनीय जीव की तरह थी जिसकी तरफ किसी ने भी ध्यान देना जरूरी नहीं समझा। बेचारी के पास जब पति का सहारा था तब कभी विरोध, प्रतिरोध नहीं तो अब क्या करती? किसी तरह दिन काटती रही। घर की मालकिन होते हुए भी घर से बाहर जिसे अब दो वक्त खाना नसीब न होता।
अपमानित होकर तो शायद जिंदा रहा जा सकता है पर उपवास करके ज्यादा दिन नहीं रह सकता।  पेट की आग हाथ पसारने को मजबूर कर देती है। बहू की नजर बचाकर लुक-छिप कर अगर कोई पड़ोसी उसे एकाध रोटी दे देता तो बहू  जानने पर गालियों की ऐसी बौछार करती कि सभी ने तौबा कर ली। सब कुछ होते हुए भी वह बावली भिखारिन दर-दर की ठोकरे खाने लगी। उसपर भी बेटा और बहू उसे ‘खानदान की इज्जत पर बट्टा लगाने वाली’ घोषित करते तो कभी उससे मार पीट तक करते।
अब तो उसका घर ही छूट गया। दिन भर बस स्टैंड के बाहर आंखे बंद किये हाथ पसारे बैठा करती तो रात्रि में वहीं कहीं सो जाती। ऐसे में पेट तो भर जाता लेकिन न नहाने की जगह और न ही कपड़े बदलने धोने की सुध। विक्षिप्त सी दशा में रहने वाली उस अभागिन में कुछ राक्षसों द्वारा ‘काम’ सुख ढूंढ़ते  के समाचार  विचलित करते लेकिन किसे फुर्सत थी कि कोई कुछ करे। सभी अपने आप में मस्त और व्यस्त।
जब भी मैं बस-स्टैंड के पास से भी गुजरत तो उसकी दुर्दशा देखकर मन लालाजी के प्रति रोष से भर उठता। ईश्वर के प्रति भी मेरा विश्वास डगमगाने लगता। बड़ों से सुनता था कि ईश्वर न्यायकारी है, वह सब देखता है, जानता है  तो आखिर यह अन्याय उसे क्यों नहीं दीखता? मन-ही मन मैं  उस अभागिन के कष्ट हरने के एकमात्र उपाय की कामना करता। पर मौत भी शायद उससे रूठी हुई थी जो उसकी तरफ देखती तक नहीं जबकि पास के चौराहे पर हर रोज  होने वाली दुर्घटनाएं किसी-न - किसी की जान लेती।
पिछले दिनों स्वास्थ्य खराब होने के कारण काफी दिन घर से नहीं निकला न ही दीन-दुनिया की जानकारी मिली। आज जब बसअड्डे की ओर गया तो मेरी निगाहें उसे ढूंढने लगी। उसे वहाँ न पाकर मैंने उसके साथ बैठने वाले एक भिखारी से उसके बारे में जानना चाहा तो उसने उसकी मुक्ति का सुखद समाचार दिया।
 दरअसल बचपन में मृत्यु से मुझे डर लगता था, मन में अनेक प्रश्न उठते थे लेकिन आज मुझे लगा कि उससे बड़ा मित्र कोई दूसरा हो ही नहीं सकता। संसार के सभी मित्र, रिश्ते मतलब निकल जाने के बाद बेमानी हो सकते हैं पर मौत कभी किसी को बेसहारा नहीं छोड़ती। बेशक जिंदगी का अपना आकर्षण है, रिश्ते नातांे का मोह है, सुख की चाह है लेकिन जब यह मोह ही दुःख का मूल बन जाए तो मौत हर मर्ज की दवा होती है। मरने वाली का नर्क छूटा तो झूठे रिश्तों का कलंक। सचमुच मोक्ष मिला उस अभागिन को!-- विनोद बब्बर Contact No.--09868211911

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