रक्षाबंधन बनाम ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम’ Nation First


रक्षाबंधन बनाम ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम’
संस्कृति और पर्व एक दूसरे के ठीक उसी तरह से पूरक है जैसे नदी और जल। रक्त और मज्जा। शरीर और आत्मा। संस्कृति जीवन दर्शन, कला, साहित्य, अध्यात्म और संस्कारों जैसे असंख्य रंग-बिरंगे पुष्पों का वह गुलदस्ता है जिसकी सुगंध हजारों वर्षों से निरंतर प्रवाहमान है। पर्व समय-समय पर उस सुगंध की छटा बिखेरने का अवसर होते हैं। बाल गंगाधर द्वारा गणेशोत्सव को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ना एक उदाहरण है  कि पर्व राष्ट्र- ऋ़षियों के चिंतन का प्रसाद है जो आनंद से आरंभ होकर राष्ट्र चिंतन की ओर ले जाता है। यदि वह वैभव के प्रदर्शन और आनंद की मस्ती पर ही अटक जाते हैं तो समझा जा सकता है कि पर्व ने अपने चरम को स्पर्श नहीं किया। इसीलिए वह अपनी राह भटक गया। भविष्य में ऐसी चूक न हो इसके लिए राग, द्वेष रहित निष्पक्ष चिंतन-मंथन आवश्यक है।  
यूं तो रक्षाबंधन को सांस्कृतिक पर्व है लेकिन इस बार रक्षाबंधन राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में हमारी परीक्षा भी है। यह महत्वपूर्ण रक्षाबंधन कब से मनाया जा रहा है। किस-किसने इस पर्व मंे अपने प्राण-प्रण से रंग भरे हैं, इसपर अनेक विचार हो सकते हैं। सूक्ष्मान्वेषण करने पर सुदर्शन चक्र से श्रीकृष्ण की घायल अंगुली पर अपनी साड़ी फाड़कर बांधती द्रोपदी की छवि सामने अंकित होती है तो राजा बलि का दंभ तोड़ने का पराक्रम देखने को मिलता है। कहा तो यह भी जाता है कि देवों और दानवों के युद्ध में जब देवता हारने लगे, तब वे देवराज इंद्र के पास गए। देवताओं को भयभीत देखकर इंद्राणी ने उनके हाथों में रक्षासूत्र बाँध दिया। इससे देवताओं का आत्मविश्वास बढ़ा और उन्होंने दानवों पर विजय प्राप्त की। यदि बहुत पुराने समय में न जायें तो याद आता है कि गुजरात में नागौर किले की फिरोजशाह द्वारा घेराबंदी किए जाने पर वहाँ के राजा मानसिंह की पुत्री पन्नादेवी द्वारा अरिकन्द के राजा उम्मेद सिंह को भावभरे पत्र संग भेजी गई राखी ने गौडवान किले की पराजय और हजारों क्षत्राणियों को जौहर करने से बचा लिया था। कुछ लोग  महारानी कर्मवती द्वारा हुमायुं को भेजी राखी  की चर्चा भी करते हैं।  लेकिन यह किसे मालूम न होगा कि विदेशी आक्रांता सिकन्दर (अलेक्जेंडर) की प्रेमिका ने भारतीय नरेश पोरस को राखी बांधकर सिकन्दर की प्राण रक्षा का संकल्प लेना इतिहास का एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। कहा जाता है कि विश्वविजेता बनने निकले सिकन्दर संग युद्ध मंे एक अवसर ऐसा भी आया था जब राजा पोरस उसका आसानी से वध कर सकते थे लेकिन उन्होंने राखी की लाज रखते हुए ऐसा नहीं किया। 
राखी आज बेशक बहन द्वारा भाई को राखी बांधने तथा भाई द्वारा उसे उपहार देने तक सिमटता दिखाई दे रहा हो लेकिन कभी मातृभूमि पर आये संकट का सामना करने जा रहे वीरों को उस नगर की नारियाँ तिलक लगा, हाथ पर रक्षा सूत्र बांधते हुए जहाँ उससे वतन की रक्षा का वचन लेती थी वहीं परमात्मा से उन भुजाओं को बल और अमरत्व प्रदान करने की प्रार्थना भी करती थी ताकि वे राष्ट्र-रक्षा कर सके।
यजुर्वेदः ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः’ हम (वयं) प्रबुद्धजन (पुरोहिताः) राष्ट्र का  (राष्ट्रे) जागरण करें (जागृयाम) का उद्घोष करता है। इसका आशय स्पष्ट है कि राष्ट्र रक्षा के लिए हम सबको सावधान होकर कार्य करना चाहिए। भारतीय संस्कृति में जननी और जन्मभूमि के प्रति विशेष श्रद्धा है। पश्चिमी भक्त बेशक राष्ट्र शब्द को पश्चिमी विचारकों की देन बताये लेकिन हमारे वेदों में अनेकों बार ‘राष्ट्र’ शब्द का उल्लेख है।  किसी भी राष्ट्र के लिए उसकी सर्वभौमिकता उसकी प्राण-वायु है। पराजित अथवा पराधीन राष्ट्र को प्रतिक्षण अपमानित होना पड़ता है इसीलिए उस राष्ट्र के सुपुत्र अपने प्राणों का बलिदान देकर भी इस कलंक को समाप्त करते हैं।
इतिहास साक्षी है भारत की आजादी की लड़ाई ऐसे असंख्य बलिदानों की बुनियाद पर ही लगातार अपने लक्ष्य की और बढ़ती रही है। मंगल पाण्डे से आरंभ हुई यह श्रृंखला तिलका मांझी, लाला लाजपतराय, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अश्फाकुल्ला खां, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जैसे असंख्य, अनाम रणबांकुरों की दास्तान है। 15 अगस्त 1947 को प्राप्त हुई खंडित आज़ादी न केवल हमारे लिए बल्कि सम्पूर्ण विश्व के लिए खतरे का सबक बन रही है। न केवल अमेरिका में ट्विन टावर काण्ड  बल्कि समस्त विश्व में आतंक की काली छाया हमारी खंडित आज़ादी की अवैध संतान (पाकिस्तान) के कारण ही है। 
हम सीमापार से भड़काये जा रहे  आतंकवाद और अलगाववाद से पीडित है तो अब उसमें चीन का अधिनायकवाद भी जुड़ गया है। कभी ‘हिंदी- चीनी भाई-भाई’ का नारा लगाकर चीन ने विश्वासघात किया था। लेकिन हम सस्ते चीनी सामान के लालच में इतने डूब गये कि अपने कुटीर उद्योगों में कार्यरत लाखों स्वजनों को बेरोजगार बनाने का अपराध कर रहे हैं। हमारी अर्थव्यवस्था को गहरा आघात पहुंचाकर समृद्ध बन रहा चीन एक बार फिर धमकियों की भाषा बोल रहा है। ऐसे में हर भारतीय का कर्तव्य है कि अपनी कलाई पर ‘भारतीय रक्षा सूत्र’ (ध्यान रहे- चीनी राखी हर्गिज नहीं) बांधते/ बंधवाते हुए संकल्प ले कि हम अपमान का अमृत पीने की बजाय स्वाभिमान का विष पीने से भी पीछे नहीं हटेंगे। शत्रुवत व्यवहार करने वाले चीन से आयातित सामान को खरीदना तो दूर मुफ्त में भी स्पर्श नहीं करेंगे। 
रक्षाबंधन पर विचारणीय होना चाहिए कि परिवर्तन की इस बेला पर राष्ट्र- विरोधी शक्तियां जाति, धर्म, प्रान्त, भाषा, सम्प्रदाय के नाम पर हमे बांटने के प्रयासों को तेजी ला रही है। धर्मान्तरण उनका व्यापार है। े हमारी महान संस्कृति को बदनाम करने के लिए उन्हें ओछे हथकंडे अपनाने से भी गुरेज नहीं है। झूठे प्रायोजित आरोपों के माध्यम से राष्ट्रवादियों का रास्ता रोकने के लिए ये तत्व किसी भी सीमा तक जा सकते है। अतः इस बार रक्षाबंधन अवसर है राष्ट्र-रक्षा के संकल्प को प्रबल बनाने का। राष्ट्र-रक्षा का अर्थ उसकी सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं होता अपितु राष्ट्र की संस्कृति, उसके समस्त नागरिक, वन, पर्यावरण, परंपरा, प्रतिष्ठा की रक्षा भी शामिल है। जब तक इस राष्ट्र का एक भी नागरिक उपेक्षित है, राष्ट्र के विकास की सार्थकता नहीं हो सकती। यदि हमारा विकास हमें हमारे सांस्कृतिक मूल्यों और हमारे पूर्वजों की कीर्ति से विमुख करता है तो उस पर पुनर्विचार होना ही चाहिए।
भ्रष्टाचार देश की जड़ों को खोखला करता है। अतः नोटबंदी और जीएसटी के बाद सरकार पर भ्रष्टाचार का उद्गम और संरक्षण स्थल बन चुकी राजनीति के शुद्धिकरण के लिए कड़े कदम उठाने का दबाव बनाने के साथ ही अपना प्रतिनिधि चुनते समय उस दल विशेष के नेता और नीतियों, उसके विगत प्रदर्शन तथा उम्मीदवार के चरित्र व व्यवहार का अध्ययन जरूर करें। 
राष्ट्ररक्षा के लिए सामाजिक समरसता अनिवाय्र है। हर प्रकार के भेद को हमेशा के लिए त्याग कर ‘सभी हिन्दु सहोदर’ का भाव स्थायी रूप से हृदयांगम् करना चाहिए। कन्याभू्रण हत्या मानवता के प्रति अपराध तथा माथे पर कलंक है। इसके विरुद्ध जनजागरण के लिए स्वयं को उदाहरण के रूप मंे प्रस्तुत करने का संकल्प लेना राष्ट्र रक्षाबंधन पर हर्गिज नहीं भूला जाना चाहिए। इस दिशा में हमें आज और अभी जागना होगा वरना कल देर हो चुकी होगी। यदि बेटियां ही नहीं बचेगी तो राष्ट्र-रक्षा के लिए  वीरों को जन्म देने वाली माताएं कहाँ से आएगी? ऐसे कुछ अन्य संकल्प भी हो सकते हैं जो रक्षाबंधन को राष्ट्र रक्षाबंधन के रूप में स्थापित कर सके। 
दुनिया भर के सभी पूजा-पंथ अपने पूर्वजों के पंथ अर्थात ‘हम जो हैं उन्हीं की वजह से हैं’ के परिस्कृत विस्तार होते हैं। एक उदात्त अतीत, सांझे नायक और मिलकर चलते हुए उज्जवल भविष्य की कामना  किसी राष्ट्र की नींव होती हैं। अतीत के सांझे-गौरव और वर्तमान के सांझे-संकल्प ही भविष्य का निर्माण करते हैं। विवेक की सजगता और मन का उत्साह राष्ट्र की जीवांतता की कसौटी होती है। आइये राष्ट्र रक्षाबंधन के पावन पर्व पर हम स्वयं से पूछें कि क्या हम जीवंत राष्ट्र के जीवंत पुत्र हैं? यदि इसका उत्तर हाँ में है तो केवल आपको ही रक्षाबंधन मनाने का अधिकार है। क्योंकि आप जानते और मानते है- इदं राष्ट्राय इदं न मम!--विनोद बब्बर संपर्क-   09868211911, 7892170421 (rashtrakinkar@gmail.com)

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